रविवार, 9 दिसंबर 2018

आजमा कर देखिये......




ग़मों  से  तिलमिलाती   जिंदगियाँ ,  कभी  ग़मों  से  मिल  कर  देखिये , 
  पिता  के  प्यार  से  महरुम  बच्चे , जवानों   के  परिवार  में  देखिये |

मिट्टी  में  खुशबू , हवाओं   में  अपनापन  तलाश  कर  देखिये , 
मोहब्बत  आज भी  पनपती  , जवानों   से मोहब्बत  करके  देखिये |

मोहब्बत लुटा कर,  लुटा देते  जिंदगी ज़माने में  ऐसे  मेहमान देखिये, 
   ज़िंदा  रहते   हुए   फिर  कभी  न  मिलने  का  अहसास  देखिये |

गुरुर  में   हिलोरे  मार  रहा  मन ,  क़दमों   का  जुनून   देखिये,
रग   रग  में    दौड़ता   देश   प्रेम,   वरदी   को  छू   कर   देखिये |

ठंड  की  ठिठुरन , गर्मी   की   तपन,  प्रकृति  का  ऐसा  रुप  देखिये, 
कैसे  होती  है  मुल्क़  की  हिफ़ाज़त   जवानों की   आँखों  में  देखिये ? 

मोहब्बत  का  फ़लसफ़ा ,   शहीद   की   तड़पती  रुह  से  पूछिये, 
आँखों  में   गुज़री   रात  ,  जिंदगी   का    हसींन   मंज़र   देखिये |

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

घनाक्षरी छंद



                                       
 8,8,8,7,वर्णो  का विधान 16, 15 पर यति 
         31, वा वर्ण दीर्घ  |

मोहब्बत से सराबोर आँखें बरस  रही ,
लफ़्ज  ख़ामोश  रहे  धड़कन कह रही  |

जज़्बात  मोहब्बत के  उर  से  उफ़न रहे, 
आँखों  में  तैरते  सपनें  दास्तां  कह  रहे |

तेरी  यादों  का करवा दिल में दफ़न रहा, 
टूटे  दिल की दरारों में  वही   झाँक रहा  |

मोहब्बत -ए -पैगाम दिल में दफ़न किया, 
हवाओं  को सीने  से लगा राज कह दिया |

  कैसे अदा करुँगी  मोहब्बत का नज़राना, 
  तेरे  सीने  से लग भूल जाती हूँ जमाना  |

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

गूँज शहनाई की...


                                                  
पुरवाइ   संदेश  है  लाई, 
   उपवन   महका, 
सूरज ने किरनें  बरसाई  ,
खग  ने  मीठी  राग  सुनाई,  
गूँज  उठी   मीठी   शहनाई ,

पीली  हल्दी ,  चमके  कंगना, 
लाल   चुनरियाँ,  सुर्ख   जोड़ा  
सिंदूरी   मंद -मंद  मुस्काई 
सप्त   फेरों  में  मिले  क़दम 
रिश्तों   की   गाँठ   सुहानी 
अश्रु    से  भीगी   खुशियां 
पुरवाई   संदेश  है   लाई 
गूँज   उठी   मीठी   शहनाई


तङपता  ह्रदय , बेचैन  आँखें, 
माँ  के  मन  में  झलके  अश्रु , 
पिता   के  ह्रदय  ने  बात  बताई , 
बेटी   मेरी  ह्रदय  का  टुकड़ा , 
    जग  ने  रीत  बनाई ,
चिड़ियाँ   मेरी   हुई   पराई ,
गूँज   रही   मीठी  शहनाई  ,

आँगन  पीपल  खेल   खिलौने , 
सजें  द्वार  पर  आम  के   पात, 
विदा   गीत  अब  गाते  है, 
पुरवाई    संदेश   है   लाई, 
गूँज   रही    मीठी   शहनाई  ,

माँ...


बुधवार, 5 दिसंबर 2018

कुछ तो कहेगें लोग.....


                              


समंदर की लहरों पर हमनें  भी  पैगाम लिखा, 
दर्द को छुपाया ,मोहब्बत को सरे आम लिखा !!

जंग  जिंदगी  की , क़त्ल   अरमानों   का   हुआ, 
सुर्खरु जनाजे में  नाम,दफ़न  प्यार का अफ़साना हुआ  !!


जिंदगी पर  तोहमत  कैसी , उम्र -ए -दराज़ मिले दिन चार ,
दो  में   बुनते  रहे  सपनें ,  दो  में  किया  इंतजार  !!

ज़माने   का  ये   हुनर,  अपनों    ने   आज़माया   है 
किसी  का  तीर,  किसी  की  कमान  से  चलाया  है  !!

हो  सितम की  इंतहा ,  रो   रही   जिंदगी , 
कहाँ   मिलेगा परवरदिगार , यही  कह रही बंदगी ? 

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

मीम की दौड़



मनु मन की एठी  हुई  निगाहें 
ह्रदय  में  उफ़न रहा दर्द ,
मीम की दौड़ में शामिल,
ह्रदय की असीम वासना !!

लहरों सी ओझल मंजिल, 
गंतव्य की ओर डगमगाते, 
न बढ़ने वाले क़दमों  की गति  !!

विचारों  की थाह में , 
गुमराह हुआ अपनत्व,   
कामयाबी की सीढ़ी से,
 कुचल रही खुशियाँ  !!

नजर आ रहे धुआँ में, 
मायूसी के काले धब्बे,
जहा कभी उजालों ने, 
अंधेरों  को  दी  पनाह   !!

क्षण भर खुशियों का ठहराव, 
वही पीङा का रुबाव ,
ठिठुर रहा ह्रदय में, 
तृष्णा का असीम लगाव बना, 
वेदना का यही भाव !

रविवार, 2 दिसंबर 2018

धरा की उलझन



 मुद्दतों  बाद निकली जब घर से ,
  ख़ामोशी  में भी  सन्नाटा पसरा  पड़ा ,   
वट वृक्ष अश्रु  बहा रहा,
धरा  भी उलझन में  खड़ी  !!

                         मोहब्बत  से  आबाद हुआ जहाँ,
                              तिनका तिनका बिख़र रहा, 
                            कभी हरा भरा रहा आँचल, 
                          बेबसी  में आज सूखा पड़ा  !!

                                 मनु  बन  हमदर्द , 
                              दर्द  को  आग़ोश  में  भर,
                              कुछ क़दम  भी न चला  , 
                         सज़दे में  सर झुका दिल रो पड़ा   !!

                             बिछा  दिया दर्द  का दरिया 
                               मनु   धरा को  बहला रहा 
                                  मोहब्बत की आड़ में    
                             गुनाह अपना   छुपाये  खड़ा  !!

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

उसूल


                                   


 परत दर परत नसीब पर बिछाते रहे , 
   ख़ामोशी भरी निगाहों से उसूल, 
       कहीं  हालात के  ,
   कहीं मन के रहे  उसूल   ,
      कुछ कर्म  से उपजे ,
     रहे  भाग्य की देन, 
      न  सह  पाई , 
     न  कह  पाई ,
समय के हाथों  उभर रहा ,
  खेला  हुआ यही  खेल !!

     दिल  कहें  यही  खेल,  
  ख़ामोशी  से  बैठी चौखट पर, 
  देख रही  कर्मो का खेल ,
     अहसास हुआ,
     मिला न कोई मेल !!

   एक पड़ाव और  गुज़रा , 
   ख़िला  एक नायाब फूल ,
      हर दिन  एक ख़्वाब 
     जिंदगी बनी  नायाब ,
  दोहरा  रही  हूँ वही  हिसाब, 
  जो बोया  मैं ने  हाथों  से, 
  निकले बन किस्मत के फूल, 
  क्यों  कहु  जिंदगी ने चुभोई कोई शूल  ?