गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

वज़ह


                                                       
                                           


एक  अरसा  गुजर  गया  तुम्हें  मुस्कराये   हुये, 
महफ़िल  में   ख़ामोशी   की  क्या  थी  वज़ह l 

मायूसी  का   लिबास  लपेट  लिया   बदन  से ,
ख़ुमारी चढ़ी  मन  में  सादगी  की  क्या थी वज़ह l

मुक्क़दर  में  नहीं  हम,  बहला  कर  ठुकरा  दिया, 
आज    पहलू  में   बैठने   की  क्या  थी   वज़ह l


तुम   मांझी   मैं   पतवार   जिंदगी   थी   नैया, 
बीच  मझधार  में   छोड़  चले  क्या  थी   वज़ह l

दफ़न   कर  दिया  यादों  के  मंज़र  को योंही ताबूत में, 
 सिसक  रहा  दिल  तरस्ती आँखों  की  क्या  थी  वज़ह l

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

वक़्त का आलम



                                             
अपने पन का नक़ाब वक़्त रहते बिख़र गया,
वक़्त का आलम रहा,  कि  वक़्त रहते सभँल गये,

हर   बार   कि  मिन्नतों  से  भी वो  नहीं लौटे, 
 इंतज़ार में  हम, वो  दिल कहीं ओर  लगा बैठें,

 मयकशी  के  आलम   में  जलते  रहे    ताउम्र,
 झुलस गई  जिंदगी ,अँगारो पर चलना सीख गये,

आलम   ही  ऐसा  बना  कि   बर्बाद  हो  गये ,
बर्बादी  ने  लगायें  चार चाँद  , मशहूर  हो गये, 

सारी   शिकायते  सारे  शिक़वे  ख़त्म  हो  गये,
आज  हम  दानदाता  और  वह  मोहताज़  हो  गये 1




सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

रुह की रानी


                                                     
उमंगीत मन
चंचल  क़दम
रुहानी मुस्कान
शब्द सरस में  सलग्न
कर क़मर इतराते
शिकायत  जमीं  पर..... 

मन मोही मासूम
झिलमिल अदा
मंद  मंद  मुस्काना
इठलाता  यौवन
एक नजर नजराना
नजरों का चुराना. .....

मोह  रही  मन
दिलकश  लज्जाना
खनक  रहे  गुमान  के  घुँघरु
लहरा रही   गुरुर की  चोटी
घर नहीं,  देश   संवार  रही
हर  घर  से  उठा  रही  कचरा
खामोश  रुह  की    रानी....  ...

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

जिंदगी का फक़त खुलासा

                                         

कभी-कभी 
वह अपने विचारों की कंघी से नाखून कुरेदती हुई,
हौले से उसाँस में सिर्फ हे राम, हे राम,  कहती, 
वह  अपनों  से  परेशान  न  थीं ।
न वह उस वक़्त अपनें प्रभु को स्मरण कर रही होती, 
न  शिकायतों का पिटारा उड़ेल कर बैठी, 
उसकी बुद्धि  क्षुब्ध और , 
विचार नये सफ़र के राही बन गये।
आज  वह तलाश  रही  अपना  वजूद,  
इस कोने से उस कोने में,
जो कभी तरासना ही नहीं। 
कुछ  खोनें का डर नहीं,
 न चाहत  उसे कल की, 
उसाँस में  फबक रहा  वक़्त  जो कही  ग़ुम हो गया,
तलाश रही अपनें निशां  जो  उकेरे   ही  नहीं, 
विचलित मन से अपनें ही क़दमों की आहट तलाश रही,
कहाँ  छुट गया वह वक़्त  जो कभी उसका हुआ करता था? 
यह जिंदगी का वह दोराह है,
 जहाँ  कल नहीं  मिलता,
आज उसके  साथ नहीं रहता।
   सांसें चल रही,
आहटों  का कोलाहल न था,
 कहाँ छुट  गया  वह वक़्त जो कभी  जिंदगी रहा  उसकी ?
 यह  जिंदगी का  वह फक़त खुलासा था,
 जो  जिंदगी भर उसने  जिंदगी के साथ किया। 

बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

उलझन


                                         

जमाना   कहता,   उलझे   उलझे   से    रहते   हो,
 कैसे  कहुँ  यही  वो  मंज़र   जिसनें  चलना सिखाया ?


यूँ   तो  जिंदगी   ने   हमें  खूब  नवाजा,
उलझन ही रही  मूक्कदर  में,  सुकू की छाँव न मिली।

मंजिल  के   दरमियां  उलझनों   का  साथ  लाजमी  था ,
चंद क़दम  होंसले  संग रखे,  सामने  मंजिल  के  निशां थें,


 उलझनों  में  तमाम  मुश्किलों  के  हल   मिले ,
 टेढ़े   मेढ़े   रास्तों  पर  मंजिल  के  निशां  मिले,


खारेपन  में   कोई   तलब    रही 
 होगी  वर्ना यूँ,
 उलझनों  में उलझी  गंगा  ढूं ढे  न   सागर  के  निशां,

मुहब्बत    होंने    लगी   उलझनों   से,     कमबख़्त
बिगङ  कर  जातीं,  सँवर  कर  आती,  और  सीने  से  लग जाती।

दास्तान पिता की

                                         
तमाम  ख़्वाहिशें  सीने में  दफ़न  किये  बैठा,
न  जाने  क्यों  वो  अरमान   जलायें  बैठा ?

आज को  गुमराह  कर  कल  को  महफ़ूज किये बैठा,
दिल  जला   शमा   बुझाये    बैठा,

जिंदगी   की   गणित   दोहराता  रहा   चारों   पहर ,
उसके   आकङे   फरेबी  नहीं    यहीं  वो  विचार,

न  जाने  कब  तू   दरवाजे  पर दस्तक दे,
इसी   बहाने  कुंडी   हटाये    बैठा,

बातें  करता  तेरे  जाने  पर  सूकून  से  जीने  की,
यादों  को  सीने  से  लगा, अश्को में  डूबा बैठा,

उसके  फलसफे  का  कारण  भी  यहीं,
कि  वो  जिंदगी  से ज्यादा  तुझसे मुहब्बत कर बैठा।

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

आखिर क्यों ?



                                               
                                                        
विचारों का प्रल्य ह्रदय को क्षुब्ध,
 मार्मिक  समय मन को स्तब्धता,
के  घनघोर  भंवर  में  डुबो बैठा,
गुरुर के  हिलोरे  मार  रहा मन,
स्वाभिमान दौड़ रहा  रग रग में,
 झलकी  न आँखों  से  लाचारी,
 न   जिंदगी  ने  भरा  दम,
 न लङखङाये   क़दम।

अकेलेपन के माँझे में उलझी
 जिंदगी  से   करती  तक़रार
नहीं  वह  लाचार, 
समाज  के  साथ  चलने   का,
हुनर  तरासती  शमशीर  रही।

देश   ऋणी   उसका,
हर रिस्ते की क़दर  दान   रही  वह,
उठते   मंज़र  को  सांसों  में  पिरोया,
हर बला  को  सिने  से  लगाया,
न त्याग  में   कटौती, न  मांगी
खुशियों  की  हिस्सेदारी,
फिर क्यों    कहता  समाज,
सहीद  की  पत्नी   को ,
बेवा   और   बेचारी ?
सराबोर क्यों न करें,
उस ख़िताब से,
जिसकी  वह  हकदार ?




रविवार, 7 अक्तूबर 2018

ॠतु राज

                                           
खुशीयों  का  संदेश  समेटें ,  
ॠतु  राज  धरा  पर  आये,
तरुओं   ने  नव  पल्लव  डालें,
 मुस्कान   धरा  की  खिल  उठी,
चिङियों  ने  भी    राग  लगाई,
मधुर  स्वर  में   ईठलाई  पवन,
मीठा  सा   संगीत   सुनाया ,
भँवरों   ने   भी   प्रीत   जताई ,
प्रीत  रंग  में   खिली   धारा,
पीला  आँचल  ख़ूब  लहराया,
प्रीत  रंग   में   नील  गगन,
हर्षोल्लास  की  बदरी  छिटकी,
खुशीयों  का  संदेश  समेटें ,
ॠतु  राज  धरा  पर  आये ।